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(साहित्य)हिंदी >> कविता >> गाँव की बूढ़ी नदी
 
 
गाँव की बूढ़ी नदी
-सुखदीप उप्पल- अपनी टिप्पणी दें



सूख गई गाँव की
बूढ़ी नदी
जिसके तटों पर दूर तक
फैले घने
साल वनों के बीच से
झाँककर
सूरज पौ फटने के दृश्यों का
आभास देता

सारा गाँव
जहाँ नित्य कर्म से निपटता
मुखारी कुल्ला करता
नहाता धोता और
रात का अलसायापन
धार में छोड़ आता

रमणियाँ सब फींच आतीं
गाँव घर की धूल
उस बूढ़ी नदी में
और लाज को लपेटे
निस्तार के लिए
घड़ा भर जल ले गाँव में ही लौट आतीं

गाँव का निर्वाण थी
आचार थी
बूढ़ी नदी
गाँव का बंधन
समय की धार थी
बूढ़ी नदी

सूख गई
गाँव की बूढ़ी नदी
जिसकी गीली रेत पर
गाँव के बचपन
लड़कपन ने
कितने घरौंदे बनाए तोड़े
मिटाए साहस ने
जिसकी माँसल देह पर
नित्य प्रति ही जीतीं
तैराकी स्पर्धाएं और
अपनी पताकाएं फहराईं

जिसके तीरे फैले
झुरमुटों में
युवा स्पंदन ने
कसमों वादों वचनों के बीच
एक दूसरे को महसूसा
स्पर्शा
अनगिनत सपने पिरोए
पींगें भरीं

गाँव का बपन थी
माँ का प्यार थी
बूढ़ी नदी
गाँव का परिवार थी
संसार थी बूढ़ी नदी।

सूख गई गाँव की
बूढ़ी नदी
जो अपने तटबंधों की
रेखा लाँघ
अचानक शोर मचाती
घुस आती
गाँव को पखारने
अपने लिए
सावन की सौगात माँगने।

साल दर साल
तिल तिल जोड़ी
राई रत्ती को समेट
अपने आँगन में बने मंदिर के
चबूतले पर सोए
किसी जोगी फकीर के
अंक में लपेट लौट जाती
वापसी की शर्त पर
सारा गाँव पेड़ों पर टँगे
मनुहारों मनौतियों के बीच
उसके पुनरागमन को निहारता
पर बूढ़ी नदी
छोड़ जाती पीछे
सैकड़ों किंवदंतियाँ
पीढ़ी दर पीढ़ी रची गढ़ी
कहानियाँ

गाँव का जीवन जतन
आधार थी
बूढ़ी नदी
गाँव की पहचान थी
दरकार थी बूढ़ी नदी।

सूख गई गाँव की बूढ़ी नदी
जिसे सारा परिवेश गाँव की
बूढ़ी गंगा कहता
शरद् पूर्णिमा को
आरती उतारता
कन्याएं
एक-एक दिया बाल
छिउला के पत्तों से बनाए
दोनों में सजा
श्रद्धा से अपनी
बूढ़ी गंगा मैया
को अर्पित करतीं
और फिर इस छोर
देवी मैया के द्वारे
फैल जाती गाँव भर की हलचल
अपनी लोक संस्कृति के साथ
कर्मा की लय पर जहाँ
रात भर सारा
गाँव थिरकता और
भिनसारे धान के
खेतों में लौट जाता

गाँव का उत्तर
अनागत काल थी
बूढ़ी नदी
गाँव की पूजा वही
उपहार थी बूढ़ी नदी।

सूख गई गाँव की
बूढ़ी नदी
जहाँ रंगों को
ऊंचाईयों पर बिखेरते
पंछी बूढ़ी गंगा की
सर्द गर्म हावाओं पर
किलकारियाँ भरते
अपनी दिनचर्या के लिए
परिचित वीथियों पर
अमृत बेला में उड़ान भरते

जिसकी चौड़ी छाती पर गाँव
दिन के पहले पहर
अपना जाल फेंक
समेट लेता असंख्य
मछलियाँ और
डोगियों में
भर मंडी से बदले में
गोधूलि तक
प्रतीक्षा करते
घर-परिवार के लिए
रोटी ले आता

गाँव भर की रीढ़ थी
पतवार थी
बूढ़ी नदी
गाँव की चिंता
जमानतदार थी बूढ़ी नदी।

सूख गई गाँव की
बूढ़ी नदी
अपने उद्गम से दूर
शहर को भिगोने की चेष्टा में
ठहर गई बूढ़ी नदी

बूढ़ी गंगा जो
समय के दौर से कभी
नहीं हारी
किसी मौसम से
जिसने गाँव के
संस्कारों को पराजित नहीं
होने दिया
एक भीड़ को अपनी
आपूर्ति की कोशिश में
बहक गई और
नगरांचल में
छोड़ आई
अपना जलीय आँचल

परास्त कर दी उसने
गाँव की जिजीविषा और
अपने स्वेद सिक्त देह
के साथ लोगों की देह में
सूख गई

इस तरह टूटी
बड़ी लाचार सी बूढ़ी नदी
जो कभी जीवन-मरण का
सार थी
बूढ़ी नदी।

सूख गई गाँव की
बूढ़ी नदी
बूड़ गई शहर की
सौगात में
बूढ़ी नदी।
अब नहीं डुबकी लगातीं
गोरियाँ
बूढ़ी नदी में
अब नहीं गगरी
डुबाती छोरियाँ
बूढ़ी नदी में
कोई मछली तैरती नहीं
नदी की
रेत में
मर गए बगूले धवल सारे
झुलसते खेत में

भूल गई अपनी गढ़ी हुई
गैल को
बूढ़ी नदी
ढो रही सारे शहर की
मैल को बूढ़ी नदी

अब नदी बासी बहुत है
अब नदी प्यासी बहुत है
अब नदी जीवन नहीं है
अब नदी पावन नहीं है
अब नदी भीगी नहीं है
गाँव का सावन नहीं है

मर गई है गाँव की बूढ़ी नदी।

 
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