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(साहित्य)हिंदी >> कविता >> मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमसे हूँ
 
 
मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमसे हूँ
-प्राण शर्मा- अपनी टिप्पणी दें

मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ
क्यों कर रहे हो आज तुम उल्टे तमाम काम

अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम
तुम बोओगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम

कहलाओगे जहान में तब तक फकीर तुम
बन पाओगे कभी नहीं जग में अमीर तुम

जब तक करोगे साफ़ न ज़मीर तुम
उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हे

जो उल्टी--सीधी चाल से फुसलाते हैं तुम्हे br/> नागिन की तरह चुपके से डस जाते हैं तुम्हे

जो कौमें एक देश की आपस में लड़ती हैं
कुछ स्वार्थों के वास्ते नित ही झगड़ती हैं

वे कौमें घास- फूस की मानिंद सड़ती हैं
ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं

गिरवी रखोगे देश की किस्मत कभी नहीं
बेचोगे अपने देश की इज्ज़त कभी नहीं

देखो , तुम्हारे जीने का कुछ ऐसा ढंग हो
अपने वतन के वास्ते सच्ची उमंग हो
मक़सद तुम्हारा सिर्फ बुराई से जंग हो

जग में गंवार कौन बना सकता है तुम्हे
बन्दर का नाच कौन नचा सकता है तुम्हे
तुम एक हो तो कौन मिटा सकता है तुम्हे

चलने न पायें देश में नफरत की गोलयां
फिरकापरस्ती की बनें हरगिज़ न टोलियाँ
सब शख्स बोलें प्यार की आपस में बोलियाँ

मिलकर बजें तुम्हारी यूँ हाथों हाथों की तालियाँ
जैसे कि झूमती हैं हवाओं में डालियाँ
जैसे कि लहलहाती हैं खेतों में बालियाँ


सोचो ज़रा विचारों कि तुमसे ही देश है

हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है
तुम देश को संवारो कि तुमसे ही देश है


पता-3, CRAKSTON CLOSE, COVENTRY CVE5EB
UK.

 
 बलराम अग्रवाल
इस रचना ने उर्दू के शीर्ष शायर नजीर की याद ताजा कर दी। इसका रंग उनकी अन्य गजलों से अलग-सा है और इसमें देश के प्रति उनकी चिंता प्रभावित करती है।
बलराम अग्रवाल
5/6/2009
 रूपसिंह चन्देल
हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है’ प्राण जी आपकी गज़लें इतनी सहज और सरल भाषा में होती हैं कि मन में उतर जाती हैं. समकालीन गज़लकारों में न केवल आप वरिष्ठ हैं, बल्कि शीर्ष पर भी हैं. बधाई, रूपसिंह चन्देल
रूपसिंह चन्देल
5/5/2009
 अहमद अली बर्क़ी आज़मी
प्राण शर्मा की यह कविता दे रही है यह पयाम देश का हो नाम रौशन कीजिए कुछ ऐसे काम सामयिक उनकी यह कविता है समय की एक पुकार बा मुसलमाँ अल्लाह अल्लाह,बा बरहमन राम राम है सुरक्षा देश की सर्वोपरि हर हर चीज़ से देश सेवा से नहीँ है बढ के कोई और काम हैँ बहुत ही लाभदायक उनके यह उत्तम विचार करता है अहमद अली बर्क़ी उन्हेँ सादर प्रणाम अहमद अली बर्क़ी आज़मी
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
5/4/2009
 महावीर शर्मा
समसामयिक कविता देश के प्रति भावों, विचारों और आशावादी अभिवृत्ति के अपूर्व सामंजस्य गुम्फन के कारण प्राण शर्मा जी की यह सारगर्भित रचना है। देश-प्रेम, मानव-प्रेम, सामाजिक मूल्यांकन आदि आइने की तरह स्पष्ट नज़र आरहे हैं। इस कविता में करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिए हैं। कविता हो या गज़ल हो, इसके लिए कुशल शिल्पी बनना होता है जिससे शब्दों को तराश कर, उन्हें मूर्तरूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें और पंक्तियों में अपने भावों, उदगारों, अनुभूतियों के उमड़ते हुए सैलाब को बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें। यह गुण प्राण शर्मा की इस कविता में सपष्ट रूप से लक्षित होते हैं। प्राण शर्मा और 'देशकाल' के संपादक-मण्डल को इस सुंदर कावता के लिए अनेक धन्यवाद। महावीर शर्मा, लंदन।
महावीर शर्मा
5/4/2009
 योगेंद्र कृष्णा
एक और अच्छी कविता के लिए प्राण जी को बहुत-बहुत बधाई…
योगेंद्र कृष्णा
5/4/2009
 satpal
bahut achChi rachna!
satpal
5/4/2009
 ashok andrey
priya bhai pran jee pehli baar aapki kavita padii ek kavi ko vakei desh ke prati savmvaedansheel hona chahiye tabhi to use log sunenge aapne jis tarah se sandesh dene ke saath ek aasha vyakt ki hai main sochta hoon uska swagat hona hii chahiye aaj bharat ko aap jaisii soch wale kaviyon kii behad jarurat hai jinke ek aavaahan par har aadmi desh ke prati kuchh kar gujarne ke liye ek junun ki hadd tak pagalpan paida kar sake ashok andrey
ashok andrey
5/3/2009
 acharya sanjiv 'salil
प्राण जी की यह रचना कविता नहीं 'शब्द-संवाद' है. प्राण जी पूरी निडरता और बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात पूरी दमदारी से कहते हैं. 'तुम बोओगे बबूल तो होंगे कहाँ से आम ', 'उनसे बचो सदा कि जो भटकाते हैं तुम्हे ', 'ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं ' जैसे संवाद अगर कविता के बहार हों तो किसी नाटक के अंश लगेंगे. इनकी सम्प्रेश्नीयता इतनी प्रगाढ़ है की सीधे दिल पर असर करती है. कवी घर के बुजुर्ग की तरह पूरे अधिकार और अपनेपन से कहता है- 'हर गंदगी बुहारो कि तुमसे ही देश है तुम देश को संवारो कि तुमसे ही देश है' यह रचना किसी जुबान, विधा या शैली की नहीं देश और देशवासियों की रचना है. .
acharya sanjiv 'salil
5/3/2009
 महेंद्रभटनागर
समसामयिक परिवेश से सम्बद्ध उद्‍बोधन आम आदमी को अवश्य उद्‍वेलित करेगा। प्राण शर्मा जी युग-धर्म के प्रति सजग हैं; यह शुभ है। इस प्रकार की रचनाओं की उपादेयता सिद्ध है। साधुवाद। * महेंद्रभटनागर
महेंद्रभटनागर
5/3/2009
 डॉ.सुधा ओम ढींगरा
प्राण जी की --मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमसे हूँ--सामयिक कविता है. आज के हालत का वर्णन करते हुए ख़ूबसूरत चेतावनी है. सोचने पर मजबूर करती है.
डॉ.सुधा ओम ढींगरा
5/3/2009
 PRAKASH KUMAR SINGH
GAZAL PITAMAH KO SAADAR PRANAAM, WESE TO MAIN AAPKI GAZALON KA MURID HAMESHAA SE HI RAHA HUN JAHAAN SE MAIN HAMESHAA HI SIKHTA RAHTA HUN GAZAL LEKHAN KO LEKAR MAGAR IS DHESH KAAL ME AAPKI YE SAMSAAMAYEEK PE LIKHI GAYEE RACHANAA KE KYA KAHANE ... BAHOT HI SHAANDAR TARIKE SE AAPNE WARTAMAAN PARIVESH KO APNI RACHANAA ME JAGAH DI HAI... BAHOT ACHHEE LAGEE... ISKE LIYE AAPKO DHERO BADHAAYEE AUR AABHAAR.. AAPKI KUSHALATA KI KAMAANAA KARTE HUYE... AAPKA ARSH
PRAKASH KUMAR SINGH
5/3/2009
 गौतम राजरिशी
इस गंदगी को बुहारो कि तुमसे ही देश है.... वाह ! एक अद्‍भुत कविता
गौतम राजरिशी
5/18/2009
 vijay kumar sappatti
aadarniy pran saheb ki gazal padhne ke baad jo ek ahsaas man me bas jaata hai , uski khushboo , bahut der tak chaayi rahti hai .. main aapki gazalen bahut dil se padhta hoon aur bahut pasand karta hoon.. is gazal me aapne deshbhakti ka jo nazariya pesh kiya hai , wo kabeele-tareef hai .... mera naman mere desh ko aur aapki is gazal ko .. aapko dil se badhai ...
vijay kumar sappatti
5/13/2009
 Shrddha Jain
Pran ji ki ye kavita aaj ke halat mein chetna loutne ka kaam karti hai. jaha log dusron par desh ki raksha ka bhaar soup kar, Neta ko khraab aur desh ko badhaal bata kar sirf halat ko kos kar rah jaate hain apne kartvyon se bhaag rahe hain ...... ye kavita unhe jaagruk kar paayegi umeed hai
Shrddha Jain
5/12/2009
 लावण्या
ये प्रण करो कि खाओगे रिश्वत कभी नहीं ... प्राण भाई साहब की कविता देशवासीयोँ को सही प्रण लेने का आह्वान करती सशक्त अभिव्यक्ति है - इसी तरह इनकी कलम चलती रहे और दीपशिखा बन कर उजाला बिखराती रहे यही सद्` आशा है ध्यान दीलवाने का आभार ... ना पढती तब अफसोस रहता .. - लावण्या
लावण्या
5/11/2009
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एक भाषा हुआ करती है
साहित्य संवादददाता

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मोचीराम
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ग़ज़ल/
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सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
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ग़ज़ल
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शशिधर खां
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दो कविताएं
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