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(साहित्य)हिंदी >> कविता >> एक भाषा हुआ करती है
 
 
एक भाषा हुआ करती है
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"आपके शब्द और काव्य ही नहीं, सोच-जो दलितों-पीड़ितों की भाषा में गूँथा है...........हमसे लोकार्पण कराने से धन्य हूँ।"
ये शब्द जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने उदयप्रकाश के कविता संग्रह "एक भाषा हुआ करती है" में दर्ज़ किए हैं। मध्यप्रदेश के गुना में कविता संग्रह के विमोचन के अवसर पर जब उन्हें पहली प्रति दी गई तो उन्होंने उदयप्रकाश की कविताओं पर अपनी राय या यों कहें की भावनाएं इन्हीं शब्दों में व्यक्त कीं।
दरअसल, इस संग्रह की एक-एक कविता मेधा पाटकर के वक्तव्य की पुष्टि करती है। उदयप्रकाश की विचारधारा को लेकर चाहे जो भी संशय पैदा हुए हों या फिर खुद अपने वक्तव्यों से उन्होंने प्रश्न खड़े कर दिए हों, मगर कविताएं साफ तौर पर बता देती हैं कि वे कहाँ खड़े हैं। उनकी प्रतिबद्धताएं उन्हीं वर्गों के साथ है जिसके साथ वह पहले हुआ करती थीं, यानी शोषितों और दलितों के साथ।
यहाँ पेश है "एक भाषा हुआ करती है" कविता संग्रह में इसी शीर्षक से प्रकाशित उनकी ये कविता-


एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूँ "आँसू" से मिलता-जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार


एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद् और तीसरे दर्ज़े के जोकर
और समय की सम्मानित वेश्याएँ और क्रांतिकारी सब शरमाते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील,वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं


बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती,
गाती-बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे अाक्षर, सबसे ग़रीब और सबसे ख़ूँख्वार,
सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा,
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और ग़रीब
लफंगों की जनसंख्या की भाषा,
वह भाषा जिसे वक़्त ज़रूरत तस्कर, हत्यारे, नेता,दलाल, अफसर, भड़ुए,
रंडियाँ और कुछ जुनूनी नौजवान भी बोला करते हैं


वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिमाएँ
"ईश्वर" कहते ही आने लगती है अकसर बारूद की गंध


जिसमें पान की पीक है, बीड़ी का धुआँ, तंबाकू का झार,
जिसमें सबसे ज़्यादा छपते हैं दो कौड़ी के महँगे
लेकिन सबसे ज़्यादा लोकप्रिय अख़बार
सिफ़त मगर ये कि इसी में चलता है
कैडबरीज़, साँडे का तेल, सुज़ूकी, पिज़ा, आटा-दाल और
स्वामीजी और हाई साहित्य और सिनेमा और राजनीति का सारा बाज़ार


एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीने वाले
सत्तर करोड़ से ज़्यादा लोगों के
आँसू और पसीने और ख़ून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बाँटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिट्ठियाँ


वह भाषा जिसमें नौकरी की तलाश में भटकते हैं भूखे दरवेश
और एक किसी दिन चोरी या दंगे के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं
जिसकी लिपियाँ स्वीकार करने से इंकार करता है
इस दुनिया का समूचा सूचना जंजाल
आत्मा के सबसे उत्पीड़ित और विकल हिस्से में जहाँ जन्म लेते हैं शब्द
और किसी मलिन बस्ती के अथाह गूँगे कुँए में डूब जाते हैं चुपचाप
अतीत की किसी कंदरा से एक अज्ञात सूक्ति को अपनी व्याकुल
थरथराहट में थामे लौटता है कोई जीनियस
और घोषित हो जाता है सार्वजनिक तौर पर पागल
नष्ट हो जाती है किसी विलक्षण गणितज्ञ की स्मृति
नक्षत्रों को शताब्दियों से निहारता कोई महान खगोलविद्
भविष्य भर के लिए अंधा हो जाता है
सिर्फ हमारी नींद में सुनाई देती रहती है उसकी अनंत बड़बड़ाहट--
मंगल--शुक्र---बृहस्पति
सप्तर्षि---अरुंधती--ध्रुव---
हम स्वप्न में डरे हुए देखते हैं टूटते उल्का पिंडों की तरह
उस भाषा के अंतरिक्ष से लुप्त होते चले जाते हैं एक-एक करके सारे नक्षत्र


भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को
अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दंडनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन से संबंधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियाँ
वर्जित हैं विचार


वह भाषा जिसमें की गई प्रार्थना तक
घोषित कर दी जाती है सांप्रदायिक
वही भाषा जिसमें किसी ज़िद में अब भी करता है तप कभी-कभी कोई शम्बूक
और उसे निशाने की जद में ले आती है हर तरह की सत्ता की ब्राम्हण बंदूक


भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शॉल ओढ़ते हैं मसखरे, चाकर टाँगते हैं तमग़े
जिस भाषा के अंधकार में चमकते हैं
किसी अफसर या हुक्काम या किसी पंडे के सफ़ेद दाँत और
तमाम मठों पर नियुक्त होते जाते हैं बर्बर बुलडॉग


अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और
अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिन-भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज़ की बची हुई रोटियाँ
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी राष्ट्रीय अख़बार या
मुनाफ़ाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और पांडुलिपि


यह वही भाषा है जिसको इस मुल्क में हर बार कोई शरणार्थी,
कोई तिजारती, कोई फिरंग
अटपटे लहज़े में बोलता और जिसके व्याकरण को रौंदता
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दाखिल होता है इतिहास में
और बाहर सुनाई देता रहता है वर्षों तक आर्तनाद


सुनो दायोनीसियस, कान खोलकर सुनो
यह सच है कि तुम विजेता हो फिलहाल, एक अपराजेय हत्यारे
हर छठे मिनट पर तुम काट देते हो इस भाषा को बोलने वाली एक और जीभ
तुम फिलहाल मालिक से कटी हुई जीभों, गूँगे गुलामों और दोग़ले एजेंटों के विराट् संग्रहालयों के
तुम स्वामी हो अंतरिक्ष में तैरते कृत्रिम उपग्रहों, ध्वनि तरंगों,
संस्कृतियों और सूचनाओं
हथियारों और सरकारों के यह सच है


लेकिन देखो,
हर पाँचवें सेकेंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी


और कहता है- "माँ"!
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उदय प्रकाश इन दिनों करीब दो महीने के विदेश प्रवास पर हैं। वे यूरोप के कई देशों के कई शहरों में अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे और संगोष्ठयों में हिस्सा लेंगे। उनकी रचनाओं के अनुवाद भी इस दौरान जारी किए जाएंगे।

 
 रणवीर सिंह
मेधा पाटकर उदयप्रकाश के कविता संग्रह का विमोचन करके धन्य हुईं और हम उदयप्रकाश की कविता पढ़कर।
रणवीर सिंह
10/30/2009
 दीपक कुलश्रेष्ठ
उदयप्रकाश जी का जवाब नहीं। उन्हें पिछले एक दशक का सर्वश्रेष्ट कथाकार चुना गया था। मगर कविताओं के मामले में भी वे किसी से पीछे नहीं हैं। ये कविता इसकी मिसाल है। अगर मेधा पाटकर इस कविता संग्रह का विमोचन करके खुद को धन्य समझ रही है तो वह ग़लत नहीं है।
दीपक कुलश्रेष्ठ
10/29/2009
 रवींद्र भारद्वाज
बहुत शानदार कविता है। हिंदी की दशा-दुर्दशा पर सटीक टिप्पणी, बिना उम्मीद का दामन छोड़े। उदयप्रकाश जी को बहुत-बहुत बधाई।
रवींद्र भारद्वाज
10/29/2009
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