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ग़ज़ल/
-प्राण शर्मा- अपनी टिप्पणी दें
-1-

पालकी में बैठ कर आया करो ऐ जिंदगी
हर किसी को हर घड़ी भाया करो ऐ जिंदगी

काला काला टीका माथे पर तुम्हारे चाहिए
बन-संवर कर जब कभी आया करो ऐ जिदगी

सबसे है रिश्ता तुम्हारा सदियों से फिर पर्दा क्यों
अपना असली रूप दिखलाया करो ऐ जिंदगी

बेवज़ह हर एक पल मायूस क्यों हो आदमी
साथ अपने हर खुशी लाय करो ऐ जिंदगी

गर्मियों की तेज़ तपती धूप सी छाई हो तुम
छाना है तो बदली सी छाया करो ऐ जिंदगी

प्यार का हर राग गाती हो तो प्यारी लगती हो
प्यार का हर राग ही गाया करो ऐ जिंदगी

-2-

माना कि आदमी को हंसाता है आदमी
इतना नहीं कि जितना रुलाता है आदमी

माना,गले से सबको लगाता है आदमी
दिल में किसी-किसी को बिठाता है आदमी

कैसा सुनहरा स्वांग रचाता है आदमी
खामी को खूबी बताता है आदमी

सुख में लिहाफ ओढ़ के सोता है चैन से
दुःख में हमेशा शोर मचाता है आदमी

हर आदमी की ज़ात अजीब-ओ -गरीब है
कब आदमी को दोस्तो भाता है आदमी

सच्चाई सामने अगर आये तो किस तरह
हर सच्ची बात दिल में छिपाता है आदमी

आक्रोश, प्यार, लालसा,नफरत, जलन, दया
क्या-क्या न जाने दिल में जगाता है आदमी

ख़्वाबों को देखने से उसे रोके क्यों कोई
ख़्वाबों से अपने मन को लुभाता है आदमी

दिल का अमीर हो तो कभी देखिये उसे
क्या- क्या खज़ाने सुख के लुटाता है आदमी

पैरों पे अपने खुद ही खडा होना सीख तू
मुश्किल से आदमी को उठाता है आदमी

दुनिया से खाली हाथ कभी लौटता नहीं
कुछ राज़ अपने साथ ले जाता है आदमी
 
 अहमद अली बर्क़ी आज़मी
प्राण शर्मा की गज़ल है तर्जुमान-ए-ज़िंदगी जिस मेँ है आम आदमी का ग़म भी शामिल और ख़ुशी क्योँ न होँ हिंदी जगत मेँ सब के मंज़ूर-ए नज़र उनकी ग़ज़लोँ मेँ है बर्क़ी सोज़ व साज़-ए-ज़िंदगी
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
6/17/2009
 neeraj
गर्मियों की तेज़ तपती धूप सी छाई हो तुम छाना है तो बदली सी छाया करो ऐ जिंदगी सुख में लिहाफ ओढ़ के सोता है चैन से दुःख में हमेशा शोर मचाता है आदमी क्या खूब शेर कहें हैं आदरणीय प्राण साहेब ने...ये ही उनकी खूबी है...ज़िन्दगी के रंगों को बहुत शिद्दत से अपनी ग़ज़लों में समटने का ढंग उन्हें आता है...ये ही बात उन्हें बाकि के शायरों से अलग करती है...सादा जबान में कहे गए उनके शेर सीधे दिल में उतर जाते हैं और गहरा असर छोड़ जाते हैं...आज के दौर में उनकी शायरी बहुत बड़ी नेमत है हम सब के लिए...शुक्रिया आपका उनका कलाम पढ़वाने के लिए.... नीरज
neeraj
6/15/2009
 बलराम अग्रवाल
बेहतरीन!
बलराम अग्रवाल
6/14/2009
 महावीर शर्मा
सहज शब्दों में एक सशक्त ग़ज़ल लिखने का हुनर प्राण जी की ख़ूबी है। पढ़ते हुए ऐसा लग रहा है जैसे ग़ज़ल बोल रही हो। प्राण जी के गुणों में एक गुण यह है कि पाठक को शब्दों को समझने के लिए सर नहीं धुनना पड़ता कि शब्दकोश या लुग़ात खोल कर शब्दों के अर्थ ढूंढने पड़ें। पढ़ते हुए या कहते हुए ग़ज़ल में आनंद आने लगता है। उनकी रचनाएं पढ़ने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। महावीर शर्मा
महावीर शर्मा
6/13/2009
 - लावण्या
आ. प्राण भाई साहब की गज़लेँ पढना सदा ही एक सुखद अनुभूति देती है चूँकि इनके लेखन मेँ अनुभव जनित सत्य के साथ सँजीदा सँवेदनाएण शामिल होतीँ हैँ ..शुभकामना सहित - लावण्या
- लावण्या
6/12/2009
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एक भाषा हुआ करती है
साहित्य संवादददाता

"आपके शब्द और काव्य ही नहीं, सोच-जो दलितों-पीड़ितों की भाषा में गूँथा है...........हमसे लोकार्पण कराने से धन्य हूँ।"
ये शब्द जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने उदयप्...

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जो सयाने समय के पीछे-पीछे चलते थे
और वो भी बड़ी सावधानी से
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राम की शक्ति पूजा
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ज़िन्दा रहने के पीछे अगर सही तर्क न...
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सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर इस अल्पायु में ही उन्होंने जो कुछ लिखा वह एक अलग छाप छोड़ गया। आज भी ...

मोचीराम
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ग़ज़ल
-संजय ग्रोवर-
-1- पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी भ...
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ग़ज़ल
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-सुखदीप उप्पल-
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दो बसंत कविताएं
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इन आँखों को कभी न भाती ये हरियाली हरी-भरी मस्त होएं क्या इस बसंत में मेरी प्याली नहीं भरी दो पाए की खटमल चौकी टूटे खाट बिछाए हैं ना झाँके झोपड़ में जाए हम तो आस लगाए हैं बस...
दो कविताएं
।। विचार ।।
दफ़ना आए थे उन्हें वे लोग पहाड़ों के पार गहरी कब्रों के भीतर लेकिन वहीं हरी-हरी दूब उग आई है। भीतर की नन्हीं-नन्हीं जीवित धुकधुकियाँ भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़कर बाहर...
 
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