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ग़ज़ल
-संजय ग्रोवर- अपनी टिप्पणी दें
-1-

पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी

उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी

भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी

छोटे शहरों, छोटे लोगों को मदद मिलनी तो थी
हाकिमों के रास्ते में राजधानी पड़ गयी

कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी

‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी

हर पुरानी चीज़ रंग कर कण्ठ में लटकाए हैं
और नयी को दाबकर कहते, पुरानी पड़ गयी

दिल में फ़िर उट्ठे ख्याल ज़हन में ताज़ा सवाल
आए दिन कुछ इस तरह मुझपर जवानी चढ़ गयी

-2-

हक़ीकत में नहीं कुछ भी दिखा है
क़िताबों में मगर सब कुछ लिखा है

मुझे समझा के वो मज़हब का मतलब-
डर औ’ लालच में आए दिन बिका है

जो रात और दिन पढ़ा करते हो पोथे
कभी उनका असर ख़ुदपर दिखा है !

जब हाथों से नहीं कुछ कर सका वो
तो बोला ये ही क़िस्मत में लिखा है

असल में रीढ़ ही उसकी नहीं है
वो सदियों से इसी फन पे टिका है

-3-

तुम देखना पुरानी वो चाल फिर चलेंगे
जिससे ज़िना करेंगे उसको ही सज़ा देंगे

इक बेतुकी रवायत ऊपर से उनकी फ़ितरत
तक़लीफ भी वो देंगे, बदला भी वही लेंगे

वरना वो तुझको हंसके कमज़ोर ही करेंगे
उनपर ज़रुर हंसना जो आदतन हंसेंगे

जब आएगी मुसीबत टीवी के शहर वाले
झाँकेंगें खिड़कियों से, घर से नहीं निकलेंगे

ये शेर क्या हैं प्यारे,सब भर्ती का सामां हैं
गर पाँच नहीं होंगे तो कैसे ये छपेंगे

वो ही हैं नूर वाले जो अक्ल के हैं अंधे
जलवा भी वही लेंगे फ़तवा भी वही देंगे
 
 ashok khatrri
paglo ki dava hame khani pad gayi. bahut khob likha aapne,bhai sahab hum paglo ke beech hi rehte hai, unko dava to hamey hi khilani padegi, prayas kartey rahe, kyoki ek to kudrat ki maar doosra hum hi nahi dava kilane to vo becharey kaha jaye?
ashok khatrri
10/9/2009
 Sheeba Aslam Fehmi
Brutally honest and thought provoking writing. Is the establishment listening ?
Sheeba Aslam Fehmi
1/16/2010
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एक भाषा हुआ करती है
साहित्य संवादददाता

"आपके शब्द और काव्य ही नहीं, सोच-जो दलितों-पीड़ितों की भाषा में गूँथा है...........हमसे लोकार्पण कराने से धन्य हूँ।"
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जो सयाने समय के पीछे-पीछे चलते थे
और वो भी बड़ी सावधानी से
एक निश्चित फासला बनाए रखते हुए
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राम की शक्ति पूजा
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ज़िन्दा रहने के पीछे अगर सही तर्क न...
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मोचीराम
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ग़ज़ल/
-प्राण शर्मा-
-1- पालकी में बैठ कर आया करो ऐ जिंदगी हर किसी को हर घड़ी भाया करो ऐ जिंदगी काला काला टीका माथे पर तुम्हारे चाहिए...
कविता-कुकुरमुत्ता
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
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कविता/ ब्रम्हराक्षस
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ग़ज़ल
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-प्राण शर्मा-
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों कर रहे हो आज तुम उल्टे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो होंगे ...
तीन कविताएं
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गुस्सा और चुप्पी...... बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की एक आदिम इच्छा उबलती है जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी ...
गाँव की बूढ़ी नदी
-सुखदीप उप्पल-
सूख गई गाँव की बूढ़ी नदी जिसके तटों पर दूर तक फैले घने साल वनों के बीच से झाँककर सूरज पौ फटने के दृश्यों का आभास देता सारा गाँव जहाँ नित्य कर्म से निपटता...
दो बसंत कविताएं
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दो कविताएं
।। विचार ।।
दफ़ना आए थे उन्हें वे लोग पहाड़ों के पार गहरी कब्रों के भीतर लेकिन वहीं हरी-हरी दूब उग आई है। भीतर की नन्हीं-नन्हीं जीवित धुकधुकियाँ भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़कर बाहर...
 
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