जो सयाने समय के पीछे-पीछे चलते थे
और वो भी बड़ी सावधानी से
एक निश्चित फासला बनाए रखते हुए
मगर अवसर देखते ही पूरे कौटिल्य के साथ
चोटी को पौनीटेल में बदल लेने की धूर्तता में
घृणितता की हद तक सक्षम थे
वही दावा करते थे कि
देखो भय्या आखिर हमने
समय को बदल ही डाला न
2.
हम और हमारी संस्कृति अर्थात पता नहीं कौन है तरबूज़ा
और कौन है छुरी
जो लोग कहते थे कि
हमारी वजह से ही है संस्कृति
और सभ्यता की वजह से ही हैं हम
तो मैंने मान ली भई दूसरी बात
हां भई सभ्यता की वजह ही से तो हो तुम
ऐसी ही सभ्यता बर्दाश्त कर सकती है
हजारों-हजार साल तक तुम्हे
और फिर मैंने मान ली पहली भी बात
कि भय्या मेरे, जहां तुम हो
वहां ऐसी नहीं तो और कैसी होगी संस्कृति !
उच्चता के मापदण्ड
इस कदर नीच मानसिकता से भरे थे कि
कभी भी कोई
पोंगा, लप्पू और पिलपिला
यह घोषणा कर सकता था कि
भय्या सारी दुनिया का गुरु तो मैं ही हूँ
तिस प छाती भी वही ठोंक सकता था
दूसरे सब तो हैं अहंकारी
और हम हैं असली स्वाभिमानी
यानि जो अहंकार और स्वाभिमान में
फ़र्क तक नहीं कर सकते थे
विनम्रता उन्हीं के चेहरे से
पसीने की तरह गिरती थी
और पसीने से तोंदू समोसे के तेल की
बदबू आती थी
बहुमत में होने के चलते वे
इसे ख़ुशबू कहें तो आप क्या कर लोगे
(अल्पमत में होते हुए भी पट्ठे बहुमत में होते थे)
क्या सभी इतने उम्रदराज़ थे जो
अकसर कहते थे
कि पहले सब कुछ अच्छा था
अब सब खराब हो गया है
वो पहले था तो कब था !
देखा किसी के बाप-दादा ने भी नहीं था
सुना सबके पोतों-पड़पोतों ने भी था
3.
ज़रा अपने लिए भी सूखो प्यारेलाल
मेरी चिंता मत करो प्यारेलाल
मैं साहित्य में अपनी पहचान बनाने नहीं आया
न ही किसी शिल्प और शैली को स्थापित करने
मेरा नाम हो तो क्या
और न हो तो क्या
मैं तो समाज की अनकही असामाजिकता से
असहमतियों की वजह से आया
ढांचों और ढर्रों से नाराज़गी के चलते आया
मैं आऊँगा विचार की तरह
कहीं से भी घुस आऊँगा
कभी अपने नाम से कभी तुम्हारे
तनूंगा तम्बू की तरह
तो कभी खुल जाऊँगा परदे की तरह
जहाँ जैसी ज़रुरत होगी
इसलिए मेरी फ़िक्र मत करो दोस्त
क्योंकि मैं उस वजह से तो आया ही नहीं
जिस वजह से तुम
यानिकि साहित्य और समाज में सब कुछ
जैसे का तैसा बनाए रखने को
यानिकि कुछ भी न करते हुए
सब कुछ करने का श्रेय लेने को
अगर कोई व्यवस्था किसी को तोता-रटंत,
लकीर-पीटन और निठल्ला-बैठन के लिए
तनख्वाह/पुरस्कार/भत्ते/पत्ते देती है
तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता मेरे दोस्त कि तुम कामकाजी हो
आखि़र जिसे तुम अपना विवेक कहते हो
उसीकी आँख से देखते डर क्यों लगता है तुम्हे
कितनी भी क़लम घिसो
कितने भी मोटे फ्रेम का चश्मा तानो
पर कुछ न करना तो कुछ न करना ही रहेगा मेरे दोस्त
एक ही जगह खड़े होकर कूदते रहने को
अगर तुम सफ़र करना समझते हो तो
इसमें तुम्हारी कोई ग़लती भी नहीं मेरे दोस्त
क्योंकि दी गयी परिभाषाओं और धारणाओं से
बाहर जाकर सोचने और करने की
न तो तुम्हारी बौद्धिक सामथ्र्य है न मानसिक औकात
इसलिए अब ज़रा अपनी चिंता में भी सूखो प्यारेलाल
4.
हंसेंगे भी वो
जैसे एक दुनियादार आदमी हंसता है
एक प्रतिबद्ध साहित्यकार के माली हालात देखकर
जैसे एक अपराधी हंसता है
एक शरीफ़ आदमी की सामाजिक स्थिति देखकर
ठीक उसी तरह
पुरस्कारों, जुगाड़ों, तिकड़मों, वर्ण/जाति/पदादि की तथाकथित श्रेष्ठताओं,
संपादकीय/अखबारीय संबंधों आदि से लदा-लिथड़ा साहित्यकार
हंसता है
मौलिकता, तार्किकता, विवेक की ओर झुकाव रखने वाले
और अपनी सामथ्र्यानुसार साहित्य और समाज को बदलने की कोशिश करने वाले
एक बदनाम, ग़ुमनाम या कमनाम साहित्यकार पर
अब आप ही बताईए
हंसना किसको चाहिए
और हंसता कौन है !
( जिन पर मैंने लिखी ये कविता
उन्हें जितनी भी बार सुनाई
हर बार भूरि-भूरि प्रशंसा करके बोले
भई जिनके ऊपर लिखी है
कभी उन्हें भी तो सुनाओ )
मैंने सर पीटा
आप भी पीटो
-संजय ग्रोवर
फोन: 9910344787
Email:samvadoffbeat@yahoo.co.in
Blog : www.samwaadghar.blogspot.com