Logo
होम पेज पर जाएं  
 
विज्ञापन





 
(साहित्य)हिंदी >> कविता >> आखिरकार भेड़ें और भेड़िए ही बदलते हैं समय को
 
 
आखिरकार भेड़ें और भेड़िए ही बदलते हैं समय को
संजय ग्रोवर की कविताएं अपनी टिप्पणी दें

जो सयाने समय के पीछे-पीछे चलते थे
और वो भी बड़ी सावधानी से
एक निश्चित फासला बनाए रखते हुए
मगर अवसर देखते ही पूरे कौटिल्य के साथ
चोटी को पौनीटेल में बदल लेने की धूर्तता में
घृणितता की हद तक सक्षम थे
वही दावा करते थे कि
देखो भय्या आखिर हमने
समय को बदल ही डाला न


2.


हम और हमारी संस्कृति अर्थात पता नहीं कौन है तरबूज़ा


और कौन है छुरी


जो लोग कहते थे कि
हमारी वजह से ही है संस्कृति
और सभ्यता की वजह से ही हैं हम
तो मैंने मान ली भई दूसरी बात
हां भई सभ्यता की वजह ही से तो हो तुम
ऐसी ही सभ्यता बर्दाश्त कर सकती है
हजारों-हजार साल तक तुम्हे
और फिर मैंने मान ली पहली भी बात
कि भय्या मेरे, जहां तुम हो
वहां ऐसी नहीं तो और कैसी होगी संस्कृति !


उच्चता के मापदण्ड
इस कदर नीच मानसिकता से भरे थे कि
कभी भी कोई
पोंगा, लप्पू और पिलपिला
यह घोषणा कर सकता था कि
भय्या सारी दुनिया का गुरु तो मैं ही हूँ
तिस प छाती भी वही ठोंक सकता था
दूसरे सब तो हैं अहंकारी
और हम हैं असली स्वाभिमानी


यानि जो अहंकार और स्वाभिमान में
फ़र्क तक नहीं कर सकते थे
विनम्रता उन्हीं के चेहरे से
पसीने की तरह गिरती थी
और पसीने से तोंदू समोसे के तेल की
बदबू आती थी


बहुमत में होने के चलते वे
इसे ख़ुशबू कहें तो आप क्या कर लोगे
(अल्पमत में होते हुए भी पट्ठे बहुमत में होते थे)


क्या सभी इतने उम्रदराज़ थे जो
अकसर कहते थे
कि पहले सब कुछ अच्छा था
अब सब खराब हो गया है
वो पहले था तो कब था !
देखा किसी के बाप-दादा ने भी नहीं था
सुना सबके पोतों-पड़पोतों ने भी था


3.


ज़रा अपने लिए भी सूखो प्यारेलाल


मेरी चिंता मत करो प्यारेलाल
मैं साहित्य में अपनी पहचान बनाने नहीं आया
न ही किसी शिल्प और शैली को स्थापित करने


मेरा नाम हो तो क्या
और न हो तो क्या


मैं तो समाज की अनकही असामाजिकता से
असहमतियों की वजह से आया
ढांचों और ढर्रों से नाराज़गी के चलते आया


मैं आऊँगा विचार की तरह
कहीं से भी घुस आऊँगा
कभी अपने नाम से कभी तुम्हारे
तनूंगा तम्बू की तरह
तो कभी खुल जाऊँगा परदे की तरह
जहाँ जैसी ज़रुरत होगी
इसलिए मेरी फ़िक्र मत करो दोस्त


क्योंकि मैं उस वजह से तो आया ही नहीं
जिस वजह से तुम
यानिकि साहित्य और समाज में सब कुछ
जैसे का तैसा बनाए रखने को
यानिकि कुछ भी न करते हुए
सब कुछ करने का श्रेय लेने को


अगर कोई व्यवस्था किसी को तोता-रटंत,
लकीर-पीटन और निठल्ला-बैठन के लिए
तनख्वाह/पुरस्कार/भत्ते/पत्ते देती है
तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता मेरे दोस्त कि तुम कामकाजी हो
आखि़र जिसे तुम अपना विवेक कहते हो
उसीकी आँख से देखते डर क्यों लगता है तुम्हे


कितनी भी क़लम घिसो
कितने भी मोटे फ्रेम का चश्मा तानो
पर कुछ न करना तो कुछ न करना ही रहेगा मेरे दोस्त
एक ही जगह खड़े होकर कूदते रहने को
अगर तुम सफ़र करना समझते हो तो
इसमें तुम्हारी कोई ग़लती भी नहीं मेरे दोस्त
क्योंकि दी गयी परिभाषाओं और धारणाओं से
बाहर जाकर सोचने और करने की
न तो तुम्हारी बौद्धिक सामथ्र्य है न मानसिक औकात


इसलिए अब ज़रा अपनी चिंता में भी सूखो प्यारेलाल


4.


हंसेंगे भी वो


जैसे एक दुनियादार आदमी हंसता है
एक प्रतिबद्ध साहित्यकार के माली हालात देखकर
जैसे एक अपराधी हंसता है
एक शरीफ़ आदमी की सामाजिक स्थिति देखकर


ठीक उसी तरह
पुरस्कारों, जुगाड़ों, तिकड़मों, वर्ण/जाति/पदादि की तथाकथित श्रेष्ठताओं,
संपादकीय/अखबारीय संबंधों आदि से लदा-लिथड़ा साहित्यकार
हंसता है
मौलिकता, तार्किकता, विवेक की ओर झुकाव रखने वाले
और अपनी सामथ्र्यानुसार साहित्य और समाज को बदलने की कोशिश करने वाले
एक बदनाम, ग़ुमनाम या कमनाम साहित्यकार पर


अब आप ही बताईए
हंसना किसको चाहिए
और हंसता कौन है !


( जिन पर मैंने लिखी ये कविता
उन्हें जितनी भी बार सुनाई
हर बार भूरि-भूरि प्रशंसा करके बोले
भई जिनके ऊपर लिखी है
कभी उन्हें भी तो सुनाओ )


मैंने सर पीटा
आप भी पीटो


-संजय ग्रोवर


फोन: 9910344787
Email:samvadoffbeat@yahoo.co.in
Blog : www.samwaadghar.blogspot.com

 
 sudhir Pareek
aapki kavitayen bahut acchi lagi,sattayer vyanga hai,apki profile men ya deshkaal men acche kaviyon ki chuninda kavitayen hain,jaise ki kukurmutta,collection accha hai,mujhe bahut pasand aaya,dhanyavad,apka uttar aane ke baad main aapko apne akhabar ki prati post karunga mere akhabar ka naam hai 'GADHA PACCHISI'
sudhir Pareek
10/9/2009
 संजय ग्रोवर
भाई सुधीर जी, प्रेरणा और प्रशंसा के लिए बहुत-बहुत आभार। सीधी-सरल भाषा में लिखा कुकुरमुत्ता मुझे भी प्रिय है। आपके अखबार का नाम ‘गधा-पच्चीसी’ काफी अर्थपूर्ण है। अगर देशकाल संपादक अनुमति दे ंतो पता प्रस्तुत है - 147ए, पाकेट ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95 । अन्यथा बज़रिए ईमेल भी संपर्क संभव है।
संजय ग्रोवर
10/11/2009
Advertisement

एक भाषा हुआ करती है
साहित्य संवादददाता

"आपके शब्द और काव्य ही नहीं, सोच-जो दलितों-पीड़ितों की भाषा में गूँथा है...........हमसे लोकार्पण कराने से धन्य हूँ।"
ये शब्द जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने उदयप्...

राम की शक्ति पूजा
सूर्यकाँत त्रिपाठी "निराला"

हिंदी साहित्य में सूर्यकाँत त्रिपाठी "निराला" का नाम बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में सबसे ऊपर आता है। छायावाद और प्रगतिवाद की संधि बेला पर बैठकर उन्होंने ऐसा काव्य रचा जो ह...

ज़िन्दा रहने के पीछे अगर सही तर्क न...
-धूमिल-

सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर इस अल्पायु में ही उन्होंने जो कुछ लिखा वह एक अलग छाप छोड़ गया। आज भी ...

मोचीराम
-धूमिल-

सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर उनकी कविताएं आज भी लोगों की ज़बान पर रहती हैं। उनकी कविताओं में सम...

ग़ज़ल
-संजय ग्रोवर-
-1- पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी भ...
ग़ज़ल/
-प्राण शर्मा-
-1- पालकी में बैठ कर आया करो ऐ जिंदगी हर किसी को हर घड़ी भाया करो ऐ जिंदगी काला काला टीका माथे पर तुम्हारे चाहिए...
कविता-कुकुरमुत्ता
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आया मौसम खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका जमा था रोबोदाब वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता उठाकर सर शिखर से अकडकर बोला कुकुरमुत्ता अबे, सुन बे गुलाब भूल मत जो पा...
सबसे ख़तरनाक है सपनों का मर जाना
-अवतार सिंह पाश-
पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की एक-एक कविता सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष का ज़िंदा दस्तावेज़ है। वे शहीद भगत सिंह की परंपरा के सिपाही थे और 1988 में सिख उग्रवादियों ने उन...
दुष्यंत की परम्परा का आलोक
-डॉ नामवर सिंह-
ग़ज़ल अब नागरी लिपि में भी लिखी जा रही है। और ख़ूब लिखी जा रही है। दरअसल उर्दू और हिंदी का ये फ़ासला बहुत पहले मिटा दिया गया था। मीर की शायरी का बहुत सा हिस्सा ऐसा है जिसमें हिंदी ...
कविता/ ब्रम्हराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठण्डे अंधेरे में बसी गहराइयाँ जल की... सीढ़ियाँ डूबी अनेकों उस पुराने घिरे पानी में... समझ में आ न सकता हो कि जैसे...
ग़ज़ल
-आलोक श्रीवास्तव-
विदिशा मध्यप्रदेश के रहने वाले आलोक श्रीवास्तव ने बहुत कम समय में एक शायर और कवि के रूप में अपनी पहचान बनाई है। ऊर्दू के ख्यात शायरों की पुस्तकों का संपादन कर चुके आलोक की रचनाएं स...
मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमस...
-प्राण शर्मा-
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों कर रहे हो आज तुम उल्टे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो होंगे ...
तीन कविताएं
-प्रियदर्शन-
गुस्सा और चुप्पी...... बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की एक आदिम इच्छा उबलती है जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी ...
गाँव की बूढ़ी नदी
-सुखदीप उप्पल-
सूख गई गाँव की बूढ़ी नदी जिसके तटों पर दूर तक फैले घने साल वनों के बीच से झाँककर सूरज पौ फटने के दृश्यों का आभास देता सारा गाँव जहाँ नित्य कर्म से निपटता...
दो बसंत कविताएं
शशिधर खां
इन आँखों को कभी न भाती ये हरियाली हरी-भरी मस्त होएं क्या इस बसंत में मेरी प्याली नहीं भरी दो पाए की खटमल चौकी टूटे खाट बिछाए हैं ना झाँके झोपड़ में जाए हम तो आस लगाए हैं बस...
दो कविताएं
।। विचार ।।
दफ़ना आए थे उन्हें वे लोग पहाड़ों के पार गहरी कब्रों के भीतर लेकिन वहीं हरी-हरी दूब उग आई है। भीतर की नन्हीं-नन्हीं जीवित धुकधुकियाँ भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़कर बाहर...
 
©Deshkaal.com. All Right Reserved. Powered By: Web