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कार्पोरेट के वारे-न्यारे,आम अवाम को...
विशेष संवाददाता
जब अर्थव्यवस्था तेज़ी के दौर में थी तब भी सारी रियायतें और सहूलियतें उद्योग और व्यापार जगत को दी जा रही थीं और अब जबकि मंदी की मार पड़ रही है तो वही कार्पोरेट जगत कटोरा लिए सरकार क...
पाउच में दाल,गरीबी का देखो हाल
ब्रजेश

दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ वाले दिन अब लद गये। मध्यप्रदेश के कस्बों में अब दाल पैकेट नहीं पाउच में मिल रही हैं। ये पाउच एक रूपए से लेकर दो रूपए पांच रूपए और दस रूपए तक के हैं...

ख़ास ख़बर
"चमकते भारत" में बेरोज़गारों की बढ़...
प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का कोई असर भारत पर नहीं पड़ेगा। वे या तो खुद भ्रम में हैं या फिर देश को भ्रम में रखना चाहते हैं। लेकिन हक़ीक़त ये हैं कि मंदी की ...
खुदरा बाज़ार को खोलने के ख़तरे
-आर्थिक संवाददाता-
नवगठित केंद्र सरकार के हाव-भाव से दिखाई दे रहा है कि वह अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुदरा बाज़ार को खोलने के लिए बेचैन हो रही है। आर्थिक उदारवाद का समर्थक मीडिया इसके लिए सरकार...
भारत के झुकने से खेती पर बढ़ा ख़तरा
-वाणिज्य संवाददाता-

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ज़मीन पर फूटे बदलाव के बीज
-शिरीष खरे-
जिन दलितों से रोजाना रोटी की उलझन नहीं सुलझती थी अब वही पत्थरों के रास्ते बदलाव की तरकीब सुझा रहे हैं। जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करने की सूझ अतिशेक्ति अंलकार जैसी लग...
 
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