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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सुब्हे-आज़ादी
ये दाग़ दाग़ उजाला,ये शबगज़ीदा1 सहर वो इंतिज़ार था जिसका,ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर चले थे यार के म...
दास्तान-ए-मीर
अख़लाक़ उस्मानी
यारों मुझे मुआफ़ करो, मैं नशे में हूँ, अब दो तो जाम ख़ाली ही दो, मैं नशे में हूँ एक-एक फ़र्ते दौर (कालखंड) में यूँ ही मुझे भी दो, जामे शराब पुर (पूरा जाम भरना) न करो, मैं नश...
 
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