ख़बरों के पैकेज का काला धंधा
कागद कारे/ प्रभाष जोशी
उनका कुछ नाम भी है और काम भी। बरसों से हमारे दोस्त हैं। लेखक और समाजसेवी पिता के कारण बचपन से पत्रकारिता करने लगे। समाज को बदलने और बनाने की तलवार मान कर। पिछले आठ-दस साल से कोई...
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यह नई पत्रकारिता है जी
कागद कारे/ प्रभाष जोशी
वे जब सूचना के जन अधिकार अभियान के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो अरविंद केजरीवाल से मिलना जुलना होता था। फिर जब सूचना के अधिकार का कानून बन गया तो केजरीवाल ने दिल्ली जैसे महानगर में...
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चौकीदार का चोर होना
कागद कारे/ प्रभाष जोशी
चुनाव की खबरों को बेचने का काला धंधा ऐसा नहीं कि अखबारों ने कोई छुपाते और लजाते हुए किया हो। छोटे-मोटे स्ट्रिंगर से लेकर संपादक और मालिक तक और उधर छुटभैये कार्यकर्ता से लेकर उम्मीद...
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बिना बहस के.......?
कागद कारे/ प्रभाष जोशी
पटना में इस बार एक नए पाठक मिले। नए तो वे मेरे लिए हैं। नहीं तो उमर और अनुभव में तो वे मुझसे भी पुराने हैं। बिहार चैंबर्स ऑफ कामर्स के अध्यक्ष रह चुके हैं। युगेश्वर पांडेय। कहने आए...
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पच्चीस साल बाद भी (कागद कारे की अंत...
प्रभाष जोशी
चर्चा के बाद उसमें भाग लेने वाले कम से कम तीन मित्रों ने पूछा-तो क्या इंदिरा गाँधी के बारे में आपने अपनी राय बदल ली है?
पच्चीस साल में पूरा स...
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काले धंधे के रक्षक
कागद कारे/प्रभाष जोशी
चलो कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाज़ुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को ख़बर बनाकर बेचने वाला अख़बार मालिक,उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई ...
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मीडिया पर लोक निगरानी
कागद कारे/प्रभाष जोशी
यह जानते हुए भी कि पिछड़ों, दलितों और वाम सरोकारों के तथाकथित रक्षकों की राय में मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है, हमने हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के दौरान मीड...
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प्रभाष जी ये सवाल जवाब माँगते हैं.....
देशकाल
वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने रविवार.कॉम को दिए इंटरव्यू में जाति और परंपराओं के संबंध में कई ऐसी बातें कही हैं जिनसे उनके प्रशंसक स्तब्ध, नाराज़ और दुखी हैं। वेबसाइट में प्रकाश...
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एक दिन बाद ही सही
कागद कारे/ प्रभाष जोशी
पंद्रह अगस्त के दिन मैं अपने से पूछता रहा कि अपना देश और अपनी आज़ादी क्या इतनी भुरभुरी और रेतीली है कि चीन जैसा पडोसी देश चाहे तो हमें तीस-पैंतीस टुकड़ों में तोड़ के रख दे? हम क...
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