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जूते की जय हो...!
जूता चाहे बुश पर चला हो या फिर चिदंबरम पर, उसने असर ज़रूर दिखाया है। सदी के सबसे बड़े हत्यारे बुश की दुनिया भर में बेइज़्जती हुई तो चिदंबरम पर चले जूते ने दागी नेताओं के टिकट काटने के लिए काँग्रेस को मजबूर कर दिया। यानी जूता विरोध जताने और अपनी बात मनवाने के एक नए हथियार के रूप में सामने आया है। लेकिन इसके अपने ख़तरे भी हैं। ये ठीक है कि नेता अब भयभीत हो गए हैं मगर यदि जूते ज़्यादा चलने लगे तो उनका असर ख़त्म हो जाएगा। नेता बिरादरी जूताप्रूफ यानी बेशर्म हो जाएगी। जूतों से बचने के नाना तरीके भी इस्तेमाल किए जाने लगेंगे। ये ग़लत हाथों से ग़लत व्यक्ति पर चल सकता है। इसका राजनीतिक इस्तेमाल भी किया जा सकता है। आपकी राय बहुत महत्व रखती है,हमारे लिए,आपके लिए और पूरे मुल्क के लिए,क्योंकि ऐसे मुद्दों पर चुप्पी तोड़ना ज़रूरी होता है। कुल मिलाकर जूताबाज़ी के अगर अपने फायदे हैं तो ख़तरे भी। आपको क्या लगता है कि जूतों का उपयोग होना चाहिए और होना चाहिए तो किन परिस्थितियों में किन पर। या अगर नहीं होना चाहिए तो इसे रोकने के लिए किस तरह के उपाय आप सुझाएंग? क्या इसके लिए टाडा या पोटा जैसे कानून की ज़रूरत आप महसूस करते हैं?देशकाल आपको आमंत्रित करता है इस विषय पर बहस में हिस्सा लेने के लिए। अपने विचार हमें लिखकर भेजें हम उन्हें प्रकाशित करेंगे। बहस में हिस्सा लेने के लिए कृपया मेनू बार में जाकर बीच बहस में पर क्लिक करें। क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा उसमें नीचे लिखा होगा-अपनी राय दें। आपको यहीं क्लिक करना है और जो बाक्स प्रकट होगा उसमें अपनी टिप्पणी दर्ज़ करनी है। तो फिर देर किस बात की,फौरन की बोर्ड पर उँगलियाँ चलानी शुरू कर दीजिए। धन्यवाद्..। -संपादक
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