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चुप्पी तोड़िए...। >> इस मुद्दे पर बाकि सभी की राय
 
 
चुप्पी तोड़िए...।
अगर कोई विचार पश्चिम से आता है तो हम उसे सही मानकर तुरंत स्वीकार लेते हैं। जैसा कि “वाल स्ट्रीट जनरल” में पैसे लेकर ख़बरें छापने वाली रिपोर्ट से ज़ाहिर है। भारतीय पत्रकार ये बात अरसे से लिख और बता रहे हैं मगर उसका कोई नोटिस नहीं लिया गया और अब हाहाकार मचा हुआ है। चलिए किसी भी वजह से सही,मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार को स्वीकार तो किया जा रहा है। लेकिन मसला ये नहीं है। मुद्दा ये है कि आख़िरकार मीडिया इस मुकाम तक कैसे पहुँचा कि लखनऊ के हमारे मित्र-पत्रकार को ये टिप्पणी करनी पड़ रही है कि पहले ये मिशन था अब प्रोस्टिट्यूशन हो गया है। कौन है मीडिया के इस हाल के लिए ज़िम्मेदार....उसमें भ्रष्टाचार का घुन कैसे लगा। वे कौन से हालात, कौन सी नीतियाँ हैं जिन्होंने पत्रकारिता को बदनाम गली में लाकर खड़ा कर दिया है। आपसे निवेदन है कि आप दिल खोलकर लिखें। लिखें ताकि पता चले कि मीडिया में कौन सी बीमारियाँ पैदा हो गई हैं। लिखें ताकि लोगों को पता चले कि आप भी पत्रकारिता के गिरते स्तर से चिंतित हैं और परिवर्तन चाहते हैं। लिखें ताकि दूसरों को हिम्मत और हौसला मिले। लिखें क्योंकि लिखने से चेतना पैदा होती है और चेतना किसी भी परिवर्तन की आधारभूमि तैयार करती है। लिखें क्योंकि आपकी कलम आज़ाद है। लिखें क्योंकि चुप रहना भी अपराध है। अपने विचार रखने के लिए कृपया होमपेज के मेनू बार के “बीच बहस में” कॉलम में जाएं और क्लिक करें। क्लिक करने से जो पेज खुलेगा वहाँ आप अपनी राय, विचार, सुझाव दर्ज़ कर सकते हैं। धन्यवाद्। -संपादक
 
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